सट्टा मटका SATTA MATKA, MATKA-RESULTS, KALYAN-MATKA Live Result

सट्टे का मतलब होता है जुवा और यह सट्टा मटका इंडिया में बहुत फेमस फॉर्म है जुवे का।

सट्टा लोटरी की तरह होता है जैसे हम लोटरी में एक नंबर गेस करते हैं और

उस पर दाव लगाते हैं या कहे की अपने पैसे लगाते हैं।

अगर वो नंबर आया तो हम लोटरी जीत जाते हैं और नंबर नहीं आया तो हम हार जाते हैं।

उसी तरीके से सट्टे में भी दाव लगाना होता है तो चलिए आज जानते हैं क्या है,

ये सट्टा मटका और कैसे ये इंडिया में पनप रहा है और इसकी शुरुआत कहा से हुई और इसको शुरू किसने किया।

सट्टा मटका का इतिहास

सट्टा मटका का इतिहास हमारे देश की आज़ादी से जुड़ा हुआ है ये आज़ादी के बाद से ही हमारे देश में पनपने लगा।

अगर इसके असल फॉर्म की बात करें तो उस ज़माने में बॉम्बे कॉटन एक्सचेंज के अंदर जब रेट्स ओपन होते थे।

तो उसके ऊपर शर्त लगाई जाती थी।

और वो रेट्स न्यूयोर्क स्टॉक एक्सचेंज से बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज पहुँचते थे तो यही guess करना होता था,

कि आज किस rate पर open होगा  और किस rate पर close होगा।

सट्टा मटका की भारत में शुरुआत

सन 1961 में Newyork stock exchange ने ये practice बंद कर दी,

और अब जो सट्टे लगाने वाले लोग थे उनको ये प्रॉब्लम आ गयी की इस गेम को continue कैसे रखा जाए।

और फिर उदय हुआ सट्टे के बेताज बादशाह और किंग रतन खत्री का,

फिर ये रतन खत्री का ही दिमाग था उन्ही का idea था  की आखिर सट्टे को ज़िंदा कैसे रखा जाए तो उन्होंने एक तरकीब सोची।

उन्होंने ही ये idea लगाया की 0 से लेकर 9 तक अलग अलग स्लिप्स बनाई जाए,

और फिर उन्हें एक मटके में डाल कर हिलाया जाए और उसमे से नंबर उठाया जाए जो नंबर आ गए वो नंबर ही लकी विनर नंबर है।

ऐसा  काफी समय तक चलता रहा और धीरे धीरे ज़माना बदलता रहा और इस मटका के गेम में भी change आते गए,

गेम भी बदलता रहा।

सट्टा मटका में बदलाव

अब cards आ चुके थे cards को पीस कर उसमे से तीन cards उठाये जाने लगे और नंबर खोले जाने लगे।

बहरहाल चाहे जितने भी change आ गए लेकिन इसका नाम मटका का मटका ही रहा।

सन 1962 मे एक और सट्टा मटका किंग कल्याण जी भगत ने वर्ली मटका स्टार्ट किया।

उसके ठीक 2 साल बाद रतन खत्री ने सन 1964 मे new वर्ली मटका launch किया।

दोनों का सट्टा मटका गेम तो same था लेकिन एक slide सा change था।

जो कल्याण जी भगत का मटका था वो हफ्ते मे पूरे 7 दिन चलता था।

लेकिन रतन खत्री का मटका हफ्ते मे 6 दिन ही चला करता था।

और उस दौर में टेक्सटाइल्स mills काफी ज़ोरो पर थी यानी की जिसे देखो वो मुंबई मे textiles mills में ही काम किया करता था।

तो जो टेक्सटाइल वर्कर थे सबसे ज्यादा वो ही सट्टा मटका खेला करते थे।

जिसकी वजह से बहुत से बुकी पैदा हुए और मिल्स की आस पास की दुकानों मे काफी सट्टा मटका शॉप्स ओपन हुई।

जहाँ पर लोग बुकीज के पास जाकर लोग शर्त लगाया करते थे।

सन 1980 और 1990 का जो दौर था वो सट्टा मटका बिज़नेस का सबसे सुनहरा दौर था।

सट्टे मटका गैरकानूनी खेल है

मटका बिज़नेस इसी दौर मे अपनी बुलंदी मे पहुँच गया और आप विश्वास नहीं करेंगे।

ये गैरकानूनी बिज़नेस हर महीने 500 करोड़ के टर्नओवर पर पहुँच गया।

फिर और एक दौर ऐसा भी आया जब मुंबई पुलिस ने इस गैरकानूनी सट्टा मटका पर अपना शिकंजा कसना शुरू किया।

जिसके बदले में जो बुकीज थे और जो इसके खिलाडी थे

वो मुंबई के आस पास के इलाके मे शिफ्ट होने लगे।

जिसमे सबसे अहम् तोर पर गुजरात, राजस्थान, और भी ऐसे स्टेट्स जो महाराष्ट्रा करीब में थे वहाँ पर वो लोग शिफ्ट हो गए।

और कुछ पंटर ने झट पट लोटरी, ऑनलाइन लोटरी जैसी जगह पर bait लगाना शुरू कर दिया।

और जो और ज्यादा अमीर लोग थे उन्होंने क्रिकेट पर bait लगाना शरू कर दिया।

धीरे धीरे सरकार एवं पुलिस ऐसे गैरकानूनी खेल को पकड़ने के लिए एक्टिव हुई,

और इस बिज़नेस को करने वालो के लिए शिकंजा कसने लगी।

इसका एक अच्छा प्रभाव ये हुआ की आज के युवा पीढ़ी इस गैरकानूनी खेल से काफी दूर है,

पर फिर भी बहुत से लोग आज भी इसे खेलते हैं।

मटका किंग्स तो हम आपको बताते हैं की असल मे मटका किंग किसे कहा जाता है।

सट्टा मटका किंग्स ऑफ़ इंडिया

तीन लोग हैं इस इंडस्ट्री मे जिन्हे मटका किंग के नाम से पुकारा जाता है।

नंबर 1 पर नाम आता है कल्याण जी भगत का और फिर आते हैं सुरेश जी भगत और रतन खत्री।

कल्याणजी भगत सट्टा मटका

सट्टा मटका किंग कल्याणजी भगत का जन्म कच्छ, गुजरात के कच्छ के गणेश वाला गाँव में एक किसान के यहाँ हुआ था।

कल्याणजी के परिवार का नाम गाला था और भगत का नाम, भक्ति का एक संशोधन,

कच्छ के राजा द्वारा उनके परिवार को उनकी धार्मिकता के लिए दिया गया एक शीर्षक था।

वह 1941 में बॉम्बे में एक प्रवासी के रूप में पहुंचे।

और शुरू में एक किराने की दुकान का प्रबंधन करने के लिए मसाला फेरिवाला (मसाला विक्रेता) जैसी नौकरियां कीं।

1960 के दशक में, जब कल्याणजी भगत वर्ली में एक किराने की दुकान चला रहे थे,

तो उन्होंने न्यूयॉर्क थोक बाजार में व्यापार किए गए कपास के उद्घाटन और समापन दर के आधार पर दांव स्वीकार करके सट्टा मटका जुए का बीड़ा उठाया।

वह वर्ली में अपने भवन विनोद महल के परिसर से काम करता था।

रतन खत्री का सट्टा मटका

रतन खत्री, जिसे मटका किंग के नाम से जाना जाता है,

1960 के दशक के मध्य से 1990 के दशक तक अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन के साथ एक राष्ट्रव्यापी अवैध जुआ नेटवर्क को नियंत्रित करता था।

जिसमें कई लाख पंटर्स शामिल होते थे और करोड़ों रुपये का सौदा करते थे। सट्टा मटका

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Disclaimer –

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